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Showing posts from September, 2018
स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक ? एक चुभता हुआ प्रश्न मन-मस्तिष्क में उभरकर आता है कि हम 15 अगस्त, 1947 को अधिक स्वतंत्र थे या अब हैं? यह चुभता हुआ प्रश्न हमारे उन राष्ट्रवादियों के लिए है, जो यह मानते हैं कि हम स्वतंत्र हैं। इसको परखने की शुरूआत हम बड़े-बड़े लोगों से करते हैं। इनमें नेता सबसे पहल आते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में जन-प्रतिनिधियों को उनके आकाओं द्वारा हांका जाता है। इससे भी ऊपर अच्छी हांक की नेता वर्ग में प्रशंसा भी की जाती है। इसके बावजूद कोई भी अपने रेवड़ में से भागने का प्रयत्न करे, तो उसको अनुशासित करने के लिए ‘व्हिप’ की भी व्यवस्था है। यहाँ यह बताना अनिवार्य सा लगता है कि ‘व्हिप’ की प्रथा ग्रेट ब्रिटेन से ली गई है, और इसे हमारे देश में अनुदार और अप्रजातांत्रिक माना गया है। यह कैसी विडंबना है कि पिछली शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में पृथ्वी के विशालतम साम्राज्य से टक्कर लेने वाले भारतीय नताओं को विचारों और अभियानों की स्वतंत्रता आज की तुलना में अधिक थी। उस काल में कट्टरपंथी भी थे, और वामपंथी भी; उदारवादी भी थे और अतिवादी भी; गांधीवादी भी थे और क्रांतिकारी भी। ये स...
डेटा सुरक्षा कानून हाल ही में डेटा सुरक्षा कानून का मसौदा प्रस्तावित किया गया है। विशेषज्ञों की समिति द्वारा तैयार यह मसौदा, अमेरिकी तकनीक कार्पोरेशन के प्रभुत्व से देश के नागरिकों के हितों की रक्षा कर सकेगा। यह कानून नागरिकों को डेटा के लाभ को सुरक्षित और सुगम रूप से उपलब्ध कराने का द्वार सिद्ध होगा। साथ ही इस कानून के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए नागरिकों की निजता के अधिकार की सुरक्षा की जा सकेगी। इन बातों के मद्देनजर समिति ने मोटे तौर पर चार बिन्दु प्रस्तुत किए हैं – जो भी कोई किसी का डेटा प्रयोग में लाता है, वह उस डेटा का नियंत्रक नहीं, बल्कि उसकी रक्षा के लिए जिम्मेदार या न्यासीय होगा। यह एक बड़ा परिवर्तन है। कई स्थानों पर उपभोक्ताओं से स्वीकृति ली जाती है। ‘आई एग्री’ के विकल्प पर उपभोक्ता यूं ही स्वीकृति दे देते हैं। जाहिर सी बात है कि एक आम व्यक्ति इस फॉर्म की तकनीकी भाषा को नहीं समझ पाता। कानून के द्वारा इस विसंगति को दूर करने का प्रयत्न किया गया है। अब एप या वेबसाइट का संचालक किसी उपभोक्ता की उतनी ही जानकारी प्राप्त कर सकेगा, जितनी सेवा प्रदान करने के लिए...
जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरुकता लाना जरूरी  जलवायु परिवर्तन में ऐसी शक्ति है, जो जन-जीवन को तहस-नहस भी कर सकती है, और संवार भी सकती है। इसके प्रभावों के बारे में समय-समय पर तमाम भविष्यवाणियां की जाती रही हैं। संयुक्त राष्ट्र के धारणीय लक्ष्यों से संबंधित 2018 की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि भूख और विस्थापन का एक बहुत बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि 2030 से 2050 के बीच बढ़ने वाली मृत्यु की संख्या का कारण जलवायु परिवर्तन से जन्मा कुपोषण, मलेरिया, डायरिया और बढ़ती गर्मी होगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसका दुष्प्रभाव भारत समेत अनेक विकासशील देशों पर ही अधिक होगा। विश्व बैंक का अनुमान है कि अगले तीस वर्षों में जलवायु परिवर्तन से भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 2.8 प्रतिशत की कमी आएगी, और यह देश की लगभग आधी जनता के जीवन-स्तर के हृास का कारण बनेगा। इस परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न स्वाभाविक ही उठ खड़ा होता है कि क्या जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने की संभावना रखने वाली जनता को इसके दुष्प्रभावों का ज्ञान भी है? क्या उन्हें पता है कि यह परिवर्तन उनके स्...
शहरी गरीब एवं मलिन बस्तियों की समस्या भारत में शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है। परन्तु इसके लिए पर्याप्त रूप से नीतियाँ नहीं बनाई गई हैं। प्रतिदिन हजारों लोग शहरों की ओर पलायन करते हैं। इनमें से अधिकतर शहरों की मलिन बस्तियों में रहते हैं। ये साल दर साल रहते चले जाते हैं, परन्तु अपने लिए घर नहीं जुटा पाते। अध्ययनों से पता चलता है कि गरीब एवं मलिन बस्तियों में रहने वाले लोग कर्ज और सामाजिक-आर्थिक ठहराव के दुष्चक्र में फंसे रहते हैं। इस प्रकार इनके जीवन स्तर में कभी सुधार नहीं हो पाता। क्या किया जाना चाहिए ? सबसे पहले तो अस्थायी गरीब बस्तियों में रहने वालों का सही आंकड़ा ज्ञात किया जाना चाहिए। इन बस्तियों की परिभाषा ही तरल है, जो बहुतों को गिनती में नहीं लेती। 2011 की जनगणना, गरीब बस्तियों में रहने वालों की संख्या 6.5 करोड़ दिखाती है। यह यू एन-हेबीटेट 2014 में दिए गए 1.04 करोड़ के आँकड़े से बहुत भिन्न है। गरीब बस्तियों के लिए बनाई गई नीतियाँ, भवन निर्माण, पुर्नस्थापन या इन बस्तियों के आसपास बहुमंजिली इमारतों के विकास से जुड़ी होती हैं। इन नीतियों का बस्तियों में रहने वाले लोगों के आर्थिक-स...
नक्सलियों की जड़ को पकड़ें हाल ही में गृहमंत्री ने इस बात का दावा किया है कि भारत नक्सलवाद समाप्ति के करीब है। उनका ऐसा दावा करना बताता है कि हमारे सुरक्षा बलों ने नक्सलियों को काबू में कर लिया है। दक्षिण एशियाई आतंकवाद पोर्टल के अनुसार 2018 के शुरूआती छः माह में ही पूरे देश में 122 नक्सली मारे जा चुके हैं। आठ वर्षों में पहली बार इतने कम समय में इतनी बड़ी संख्या में नक्सली मारे गए हैं। नक्सलियों के दम तोड़ने का प्रमाण उनका 223 जिलों से 90 जिलों में सिमट जाना है। जिस प्रकार से सरकार ने सुरक्षा और विकास को आधार बनाकर अपनी नीतियाँ और कार्ययोजना को अंजाम दिया है, उसी के परिणामस्वरूप नक्सली समस्या पर नियंत्रण पाया जा सका है। सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सड़क, स्कूल, मोबाईल टावर, बैंक, पोस्ट- ऑफिस आदि का निर्माण करने के साथ ही इन क्षेत्रों की गरीबी को कम करने की दिशा में कदम उठाए हैं। ब्रूकिंग्स ब्लॉक में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार 2022 तक भारत के 3 प्रतिशत से कम लोग गरीब कहलाए जाएंगे। एक अनुमान के अनुसार 2030 तक बहुत ज्यादा गरीबी वाली स्थिति तो खत्म ही हो जाएगी। नक्सलियों के...
पुलिस की भूमिका बदली जाए 1960 में भारत और अमेरिका दोनों ही देश कानून-व्यवस्था की बिगड़ी स्थिति से परेशान थे, और इससे निपटने का प्रयत्न कर रहे थे। दोनों ही देशों ने अलग-अलग रास्ते अपनाए, और अलग-अलग परिणाम भी पाए। भारत में पुलिस-व्यवस्था की शुरूआत अंग्रेजों ने की थी। जाहिर सी बात है कि अपने दमनकारी शासन की रक्षा के लिए उन्हें सैन्यवादी और कड़क पुलिस चाहिए थी, और उन्होंने वैसा ही किया। पुलिस व्यवस्था के जनक कहे जाने वाले रॉबर्ट पील ने 1829 में लंदन मेट्रोपोलिटन पुलिस की स्थापना की। पुलिस की शुरूआत के साथ ही उनका विचार था कि यह ‘नागरिकों को यूनिफार्म’ पहना देने जैसी भूमिका निभाए। उन्होंने नवनिर्मित पुलिस-बल से लोगों के बीच घुल-मिलकर काम करने और अपराध से सुरक्षा को प्राथमिकता देने की अपील की। उनके इस सिद्धान्त ने लोगों को भी अपराध रोकने में भागीदार बना दिया। यह विचार बहत ही सफल रहा। 20वीं शताब्दी में ऑटोमोबाइल और दूरसंचार के विकास के साथ ही पुलिस की भूमिका अपराध से लड़ने वाले व्यावसायिकों की हो गई और यह पूरी व्यवस्था गश्त, सेवा में तत्पर रहने और अपराध की जाँच-पड़ताल में प्रतिक्रिया...
प्रगति के लिए परंपरा से हटकर सोचने की जरूरत लेख 01 अर्थव्यवस्था के आकलन में अक्सर ऐसा होता है कि अर्थशास्त्री, प्रगति के परंपरागत निर्धारकों और सैद्धांतिक गणना को ही आधार बनाकर चलते हैं। वे अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों को नजरंदाज कर जाते हैं। विश्व और घरेलू स्तर पर विकास के कुछ ऐसे निर्धारक तत्व हैं, जो गैर-परंपरागत होने के साथ-साथ डाटा आधारित हैं। लैंगिक समानता – मैकिंस्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट की 2018 की रिपोर्ट बताती है कि अगर भारत अपने समाज और कार्यक्षेत्र में लैंगिक समानता को बढ़ावा दे, तो 2025 तक उसके सकल घरेलू उत्पाद में 770 अरब डॉलर की बढ़ोत्तरी हो सकती है। जलवायु परिवर्तन की विश्व बैंक रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण एशिया के 80 करोड़ लोग ऐसे हॉटस्पॉट में रह रहे हैं, जो जलवायु परिवर्तन से जन्मे दुष्प्रभावों का मुख्य क्षेत्र होगा। बढ़ते तापमान और अनियमित वर्षा के कारण इस क्षेत्र के लोगों का जीवन-स्तर घटेगा, मृत्यु-दर बढ़ेगी, प्रवास में वृद्धि होगी, कृषि-उत्पादकता घटेगी एवं जल की कमी होगी। इन कारणों से भारत के सकल घरेलू उत्पाद म...