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Showing posts from October, 2018
                          समय  संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसकी प्राप्ति मनुष्य के लिए असम्भव हो। प्रयत्न और पुरुषार्थ से सभी कुछ पाया जा सकता है लेकिन एक ऐसी भी चीज है जिसे एक बार खोने के बाद कभी नहीं पाया जा सकता और वह है समय। एक बार हाथ से निकला हुआ समय फिर कभी नहीं हाथ आता। कहावत में है “बीता हुआ समय और कहे हुए शब्द कभी वापिस नहीं बुलाए जा सकते।” समय परमात्मा से भी महान् है। भक्ति-साधना द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कई बार किया जा सकता है लेकिन गुजरा हुआ समय पुनः नहीं मिलता। समय ही जीवन की परिभाषा है, क्योंकि समय से ही जीवन बनता है। समय का सदुपयोग करना जीवन का उपयोग करना है। समय का दुरुपयोग करना जीवन का नष्ट करना है। समय किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता। वह प्रतिक्षण मिनट घण्टे, दिन महीने वर्षों के रूप में, निरन्तर अज्ञात दिशा को जाकर विलीन होता रहता है। समय की अजस्र धारा निरन्तर प्रवाहित होती रहती है। और फिर शून्य में विलीन हो जाती है। फ्रैंकलिन ने कहा है- समय बरबाद मत करो क्योंकि समय से ही जीवन बना है।...
मतभेदों की प्रकृति को समझें एक दूसरे से असहमति रखना, मानव की मूलभूत विशेषता है। ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा, जो किसी न किसी बात पर असहमति न रखता हो। इस व्यवहार के पक्ष में दार्शनिक तर्क देते हैं कि एक बच्चा जब ‘ना’ कहना सीख जाता है, तब वह ‘स्वयं’ या ‘मैं’ और ‘मेरा’ की एक अपनी पहचान बना लेता है। प्रारंभिक स्तर पर अपनी असहमति दिखाकर ही हम एक अलग व्यक्तित्व बनते हैं। ऐसा कोई परिवार नहीं होगा, जहाँ माता-पिता और बच्चों या बच्चों में ही आपसी असहमति न हो। ऐसा परिवार जहाँ असहमति को अधिकारों से दबाने की बजाय ग्राह्य बना लिया जाता है, वहाँ सामंजस्य रहता है। हम घर में, दफ्तर में और दोस्तों के बीच भी कई बार अपनी असहमति प्रकट करते हैं। इस माध्यम से हम उनके साथ एक संबंध स्थापित करते हैं। मित्रों के साथ हमारे संबंध इस पर निर्भर करते हैं कि मतभेदों के होते हुए भी हम उसे कैसे लेते हैं। दाम्पत्य जीवन में भी बहुत मतभेद होते हैं। अगर हमारा परिवार और मित्र-मंडल केवल उन लोगों से भरा हो, जो हमसे हर समय सहमत हों, तो वास्तव में वह परिवार और मित्र है ही नहीं। दूसरों के साथ जीवन जीने या सामाजिक अस्तित्व ...
विकास में महिलाओं की समान भागीदारी आवश्यक भारत के विकास में महिलाओं की समान भागीदारी की आवश्यकता को एक लंबे अरसे से महसूस किया जा रहा है। समानता का आधार आर्थिक हो या सामाजिक, इस पर बहस निरंतर जारी है। गहराई से देखने पर ही इस बात को समझा जा सकता है कि देश को समृद्ध बनाने के लिए महिलाओं को दोनों ही स्तरों पर भेदभाव से मुक्त करना होगा। अधिकांशतः महिलाओं से पक्षपात को आर्थिक या स्त्री-पुरूष के पारस्परिक संबंधों से जोड़कर देखा जाता है। वास्तव में तो लैंगिक भेदभाव एक ऐसा विषय है, जिसमें सोचे-समझे ढंग से ऐसी व्यवस्था निर्मित की जाती है, जिससे महिलाओं को अलग, वंचित और हाशिए पर रखा जा सके। भारत में महिलाओं की स्थिति को भेदभाव से मुक्त करने का बीड़ा सबसे पहले राजा राममोहन राय ने उठाया था। समाज में महिलाओं की भूमिका को पहचानने का दूसरा अवसर तब आया,जब गांधीजी ने स्व्तंत्रता आंदोलन को ‘एक टांग पर खड़ा’ बताया था। सन् 1947 में महिलाओं को मत का समानाधिकार देकर उनके महत्व को स्थापित किया गया। इसके बाद 2014 में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ; उज्जवला, मातृत्व अवकाश विधेयक एवं अन्य साधनों से महिलाओं को शक्त...
आर्टिफिशियल इंटेलीजेन्स  (Artificial Intelligence) आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कम्प्यूटर विज्ञान की एक ऐसी शाखा है, जिसका काम इंटेलीजेंट मशीन बनाना है। इसके अंतर्गत मशीनों को इस तरह से बनाया जाता है कि वे इंसानों जैसा ही काम कर सकें। और तो और उनकी तरह प्रतिक्रिया भी कर सकें। इस पद्धति का सीधा या मतलब कृत्रिम तरीके से विकसित की गई बुध्दिमत्ता से है। रोबोट सहित इंसान की तरह काम करने वाली सभी मशीनें इस श्रेणी में आती हैं। लेकिन ये अब तक पूरी तरह बुद्धिमान नही हो पाई हैं। वास्तव में यह पद्धति कम्प्यूटर के प्रोग्रामों को उन्हीं तर्कों के आधार पर चलाने का प्रयास करती हैं, जिसके आधार पर इंसान का दिमाग चलता है। इसका उदेश्य कम्प्यूटर को इतना स्मार्ट बनाना है कि वह अपनी अगली गतिविधि खुद तय कर सके। आर्टिफिशियल   इंटेलीजेंस   के   तीन   प्रकार   देखे   जा   सकते हैं। वीक   ए   आई  – कमजोर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को हम आर्टिफिशियल नैरो इंटेलीजेंस कह सकते हैं। यह कुछ विशेष प्रकार से काम करती है। जैसे अगर आपका कम्प्यूटर शतरंज खेल सकता है, तो...